मुहूर्त प्रकरण

               💥मृदु / मित्र 💥

   मृग अनुराधा रेवती,चित्र शुक्र के साथ।
   खेलो गावो भूषण धरो,सभी खुशी के साथ।।
अर्थात....
 शुक्रवार के दिन मृगशिरा,चित्रा, अनुराधा और रेवती नक्षत्र में से कोई हो तो मृदु /मित्र कहा जाता है ।इनमे नाटक आदि,खेल खुशी के सारे काम किये जाते है।


            💥 तीक्ष्ण /दारुण 💥
आर्द्रा श्लेषा और शनि, ज्येष्ठा मूल विचार ।
तीखा कहो दारुण करो,पापकृत अरु मार।।
अर्थात ........
शनिवार के दिन आर्द्रा, आश्लेषा,ज्येष्ठा, और मूल मे से कोई नक्षत्र हो तो दारुण/तीक्ष्ण कहा जाता है।इसमें बुरे कार्य किये जाते है।
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अतः वार+नक्षत्र के मेल से बने योग को ध्यान में रखते हुए कार्य करना चाहिए ।।

मुहूर्त प्रकरण।

                   💥नक्षत्र संज्ञक💥

          4.  मिश्रित (बुधवार +नक्षत्र )

कृतिका  हो बुधवार में,या  विशाखा  होय ।
करना मिश्रित  कार्य हो ,सिद्धि सभी मे होय ।।अर्थात
बुधवार के दिन कृतिका या विशाखा नक्षत्रों में से कोई हो तो मिश्रित कहा जाता है।इनमे मिश्रित फल माने जाते है।वृषभोत्सर्ग आदि कार्य किये जाते है।



  5. क्षिप्र /लघु (गुरुवार+नक्षत्र)

हस्त पूषा अरु अश्वनी,वार गुरु का नाम।
भूषण वस्त्र रचो सभी,करो प्रेम का दान ।।
अर्थात
गुरुवार के दिन अश्वनी पुष्य और हस्त इनमे से कोइ नक्षत्र हो तो शीघ्र फल देने वाले कार्य करने चाहिए ।इनमे आभूषण वस्त्रादि बनाना तथा पहनना शुभ होता है।

१६ संस्कार।

हमारे 16 संस्कार 

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1 गर्भाधान संस्कार ( Garbhaadhan Sanskar) - यह ऐसा संस्कार है जिससे हमें योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान प्राप्त के लिए गर्भधारण संस्कार किया जाता है। इसी संस्कार से वंश वृद्धि होती है।

2. पुंसवन संस्कार (Punsavana Sanskar) - गर्भस्थ शिशु के बौद्धिक और मानसिक विकास के लिए यह संस्कार किया जाता है। पुंसवन संस्कार के प्रमुख लाभ ये है कि इससे स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान की प्राप्ति होती है।

3. सीमन्तोन्नयन संस्कार ( Simanta Sanskar) - यह संस्कार गर्भ के चौथे, छठवें और आठवें महीने में किया जाता है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म का ज्ञान आए, इसके लिए मां उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है।

4. जातकर्म संस्कार (Jaat-Karm Sansakar) - बालक का जन्म होते ही इस संस्कार को करने से शिशु के कई प्रकार के दोष दूर होते हैं। इसके अंतर्गत शिशु को शहद और घी चटाया जाता है साथ ही वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ताकि बच्चा स्वस्थ और दीर्घायु हो।

5. नामकरण संस्कार (Naamkaran Sanskar)- शिशु के जन्म के बाद 11वें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। ब्राह्मण द्वारा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बच्चे का नाम तय किया जाता है।

6. निष्क्रमण संस्कार (Nishkraman Sanskar)  - निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। जन्म के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। साथ ही कामना करते हैं कि शिशु दीर्घायु रहे और स्वस्थ रहे।

7. अन्नप्राशन संस्कार ( Annaprashana) - यह संस्कार बच्चे के दांत निकलने के समय अर्थात 6-7 महीने की उम्र में किया जाता है। इस संस्कार के बाद बच्चे को अन्न खिलाने की शुरुआत हो जाती है।

8. मुंडन संस्कार ( Mundan Sanskar)- जब शिशु की आयु एक वर्ष हो जाती है तब या तीन वर्ष की आयु में या पांचवे या सातवे वर्ष की आयु में बच्चे के बाल उतारे जाते हैं जिसे मुंडन संस्कार कहा जाता है। इस संस्कार से बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है। साथ ही शिशु के बालों में चिपके कीटाणु नष्ट होते हैं जिससे शिशु को स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।

9. विद्या आरंभ संस्कार ( Vidhya Arambha Sanskar )- इस संस्कार के माध्यम से शिशु को उचित शिक्षा दी जाती है। शिशु को शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से परिचित कराया जाता है।

10. कर्णवेध संस्कार ( Karnavedh Sanskar) -   इस संस्कार में कान छेदे जाते है । इसके दो कारण हैं, एक- आभूषण पहनने के लिए। दूसरा- कान छेदने से एक्यूपंक्चर होता है। इससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होता है। इससे श्रवण शक्ति बढ़ती है और कई रोगों की रोकथाम हो जाती है।

11. उपनयन या यज्ञोपवित संस्कार (Yagyopaveet Sanskar) - उप यानी पास और नयन यानी ले जाना। गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार। आज भी यह परंपरा है। जनेऊ यानि यज्ञोपवित में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। इस संस्कार से शिशु को बल, ऊर्जा और तेज प्राप्त होता है।

12. वेदारंभ संस्कार (Vedaramba Sanskar) - इसके अंतर्गत व्यक्ति को वेदों का ज्ञान दिया जाता है।

13. केशांत संस्कार (Keshant Sanskar) - केशांत संस्कार अर्थ है केश यानी बालों का अंत करना, उन्हें समाप्त करना। विद्या अध्ययन से पूर्व भी केशांत किया जाता है। मान्यता है गर्भ से बाहर आने के बाद बालक के सिर पर माता-पिता के दिए बाल ही रहते हैं। इन्हें काटने से शुद्धि होती है। शिक्षा प्राप्ति के पहले शुद्धि जरूरी है, ताकि मस्तिष्क ठीक दिशा में काम करें। पुराने में गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद केशांत संस्कार किया जाता था।

14. समावर्तन संस्कार   (Samavartan Sanskar)- समावर्तन संस्कार अर्थ है फिर से लौटना। आश्रम या गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद व्यक्ति को फिर से समाज में लाने के लिए यह संस्कार किया जाता था। इसका आशय है ब्रह्मचारी व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षों के लिए तैयार किया जाना।

15. विवाह संस्कार ( Vivah Sanskar) - यह धर्म का साधन है। विवाह संस्कार सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। इसके अंतर्गत वर और वधू दोनों साथ रहकर धर्म के पालन का संकल्प लेते हुए विवाह करते हैं। विवाह के द्वारा सृष्टि के विकास में योगदान दिया जाता है। इसी संस्कार से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है।

16. अंत्येष्टी संस्कार (Antyesti Sanskar)- अंत्येष्टि संस्कार इसका अर्थ है अंतिम संस्कार। शास्त्रों के अनुसार इंसान की मृत्यु यानि देह त्याग के बाद मृत शरीर अग्नि को समर्पित किया जाता है। आज भी शवयात्रा के आगे घर से अग्नि जलाकर ले जाई जाती है। इसी से चिता जलाई जाती है। आशय है विवाह के बाद व्यक्ति ने जो अग्नि घर में जलाई थी उसी से उसके अंतिम यज्ञ की अग्नि जलाई जाती है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         

उपाय ....

शनि को अनुकूल करने के सिद्ध उपाय
प्रतिकूल समय को अनुकूल कैसे करें
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१. खाली पेट नाश्ते से पूर्व काली मिर्च चबाकर गुड़ या बताशे से खाएं.
२. भोजन करते समय नमक कम होने पर काला नमक तथा मिर्च कम होने पर काली मिर्च का प्रयोग करें.
३. भोजन के उपरांत लोंग खाये.
४. शनिवार व मंगलवार को क्रोध न करें.
५. भोजन करते समय मौन रहें.
६. प्रत्येक शनिवार को सोते समय शरीर व नाखूनों पर तेल मसलें.
७. मॉस, मछली, मद्य तथा नशीली चीजों का सेवन बिलकुल न करें.
८. घर की महिला जातक के साथ सहानुभूति व स्नहे बरते. क्योकि जिस घर में गृहलक्ष्मी रोती है उस घर से शनि की सुख-शांति व समृद्धि रूठ जाती है. महिला जातक के माध्यम से शनि प्रधान व्यक्ति का भाग्य उदय होता है.
९. गुड़ व चनें से बनी वस्तु भोग लगाकर अधिक से अधिक लोगों को बांटना चाहिए.
१०. उड़द की दाल के बड़े या उड़द की दाल, चावल की खिचड़ी बाटनी चाहिए. प्रत्येक शनिवार को लोहे की कटोरी में तेलभरकर अपना चेहरा देखकर डकोत को देना चाहिए. डकोत न मिले तो उसमे बत्ती लगाकर उसे शनि मंदिर में जला देना चाहिए.
११. प्रत्येक शनि अमावस्या को अपने वजन का दशांश सरसों के तेल का अभिषेक करना चाहिए.
१२. शनि मृत्युंजय स्त्रोत दशरथ कृत शनि स्त्रोत का ४० दिन तक नियमित पाठ करें.
१३. काले घोड़े की नाल अथवा नाव की कील से बना छल्ला अभिमंत्रित करके धारण करना शनि के कुप्रभाव को हटाता है

मुहूर्त प्रकरण। ...

 गतांक से आगे ...

                  💥 उग्र /क्रूर  💥
भरणी मघा पूर्वत्रय, बार भौम में होय ।
घात लगाना छल कपट सिद्धि इन्ही में होय।।    

       अर्थात :----
मंगलवार के दिन भरणी मघा तीनो पूर्वा इन पांच नक्षत्रो में से कोई हो तो उग्र /क्रूर कहा जाता है ।यह तांत्रिको के लिए विशेष है ।इसमें हत्या करना छल कपट करना आदि नीच कार्य किये जाते है ।।
  










                              क्रमशः.................

मुहूर्त प्रकरण ....

गतांक से आगे ....

        💥 चर/स्थिर संज्ञक💥

पुनर्वसु स्वाति श्रवण,और धनिष्ठा मान।
सोमवार को साथ कर,चलने में कल्याण।।
        ✍️  अर्थात
सोमवार के दिन पुनर्वसु स्वाति श्रवण और धनिष्ठा इनमे से कोई नक्षत्र हो चर कहा गया है।इनमे गतिशील कार्य करने चाहिए जैसे गाड़ी चलाना, फैक्ट्री ,मशीन आदि ।।



क्रमशः  ................
  



मुहूर्त प्रकरण ....

    गतांक से आगे  .....


                                                      💥 नक्षत्र की ७ संज्ञा 💥
                                                                                                                                                                                                                 💐  ध्रुव/स्थिर संज्ञा ( रविवार+ नक्षत्र )

                              ✍️                 रोहिणी,तीनो उत्तरा, वारो में रविवार ।
                                                वास्तु स्थापन,बीज वपन,बाग लगाना सार।।

                             ✍️   अर्थात  :----- रविवार के दिन रोहिणी  ,उ०फा०,उ०षा०,उ०भा०,इन चार नक्षत्र में से                                                               कोई भी नक्षत्र हो तो ध्रुव/स्थिर संज्ञक कहा जाता है इनमे स्थिर कार्य करने                                                         चाहिए जैसे  वास्तु स्थापन, बीज बोना, बाग लगाना आदि ।।



                                                                                                                                 

                                                                                                                                 क्रमश:.........



मुहूर्त प्रकरण

               💥मृदु / मित्र 💥    मृग अनुराधा रेवती,चित्र शुक्र के साथ।    खेलो गावो भूषण धरो,सभी खुशी के साथ।। अर्थात....  शुक्रवार...